हनुमानगढ जिले में नोहर तहसील के गोगामेडी में प्रतिवर्ष लगने वाला उत्तर भारत का प्रसिद्ध गोगामेडी पशु मेला इन दिनों परवान पर है। साम्प्रदायिक सद्भाव व जन -जन की आस्था के प्रतीक के रुप में प्रसिद्ध इस मेले में प्रदेश के विभिन्न हिस्सों के अलावा उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, दिल्ली, पंजाब व हरियाणा आदि राज्यों से लाखों श्रद्धालुओं की आवक श्रद्धा व भक्ति के सैलाब जैसा मंजर प्रस्तुत करती है। श्रावण शुक्ला पूर्णिमा से लेकर भाद्रपद शुक्ला पूर्णिमा तक गोगामेडी में भरने वाले इस मेले में लोग सर्वधर्म सम्भाव व राष्ट्रीय एकता की जीवंत पहचान लोक देवता वीर गोगाजी की समाधि तथा गोरखटीला पर स्थित गुरुगोरक्षनाथ के धूणे पर शीश नवाकर मनौतियां मांगते हैं। गोगामेडी मेला प्रदेश के प्रमुख पशु मेलों में से एक है तथा इस दौरान आस-पास के प्रदेशों व राज्य भर से पशु व्यापारी मुख्यतः ऊँटों के क्रय-विक्रय के लिए यहां आते है। राज्य सरकार द्वारा मेले के दौरान आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधाओं के लिए मेला क्षेत्र में जिला प्रशासन, देवस्थान विभाग, पशुपालन विभाग एवं अन्य विभागों के माध्यम से व्यवस्थाएं की जाती है। जिला प्रशासन द्वारा इस बारे मेले में श्रद्धालुओं की सुविधा तथा व्यवस्थाओं को पारदर्शी बनाने के लिए कई विशेष इंतजाम किए गए है। इस बार मेले में ३ से ५ सितम्बर तथा १९ से २१ सितम्बर तक विशेष पर्व आयोजित होंगे।
लोक देवताओं में प्रथमः जाहरवीरः-
राजस्थान के लोक देवताओं के सम्बन्ध में एक चर्चित दोहे में कहा गया है। ‘‘ पाबू, हडबू, रामदे, मांगलिया, मेहा। पांचू पीर पधारज्यों, गोगाजी जेहा‘‘
राजस्थान के पांचों लोकदेवताओं में गोगाजी को समय की दृष्टि से प्रथम माना गया है। गोगाजी के प्रति श्रद्धा, विश्वास व आस्था का भाव प्रदेश के गॉव -गॉव में देखा जा सकता है जहॉ लोग अपने आराध्य वीर गोगादेव की पूजा करते है। प्रदेश की लोक संस्कृति में गोगाजी के प्रति अपार आदर भाव की व्यापकता को देखते हुए कहा गया है कि ‘‘ गाँव - गाँव में खेजडी, गाँव- गाँव में गोगा‘‘ वीर गोगाजी का सम्मोहक, प्रेरक एवं आदर्श व्यक्तित्व इतिहासकारों, साहित्यकारों व संस्कृतिप्रमियों के लिए सदैव आकर्षण का केन्द्र रहा है। विद्वानों व इतिहासकारों ने उनके जीवन को शौर्य, धर्म, पराक्रम व उच्च जीवन आदर्शों का प्रतीक माना है।
सर्वधर्म सम्भाव की तीर्थ स्थलीः-
गोगामेडी स्थित गोगाजी का मंदिर साम्प्रदायिक सद्भाव का अनूठा प्रतीक है। मंदिर में एक हिन्दू व एक मुस्लिम पुजारी खडे रहते है। इसी कारण यहां सभी धर्मो मे विश्वास करने वाले श्रद्धालू बिना किसी भेद के एक साथ आकर शीश नवाते है। मेले के दौरान चारों तरफ से उमड रहे जन सैलाब के बीच अलग अलग समूहों से उठ -उठ कर गूंजती ‘‘जाहर वीर ‘‘ ‘‘ व ‘‘ ‘‘ गोगापीर ‘‘ के जयकारों की गूंज से सृजित भक्तिमय माहौल का साक्षात करें तो दरअसल धर्म, जाति या सम्प्रदाय जैसी बातें बेमानी हो जाती हैं। बस ऐसा प्रतीत होता है कि आराध्य देव वीर गोगाजी तथा गुरु गोरक्षनाथ के प्रति भक्ति की कोई अविरल धारा बहती जा रही है।
लोकमान्यता व लोककथाओं के अनुसार गोगाजी को सांपों के देवता के रूप में भी पूजा जाता है। लोग उन्हें गोगाजी चौहान, गुग्गा, जाहिरवीर व जाहिर पीर के नामों से पुकारते हुए अपने भावों का इजहार करते है। इनका अवतरण गुरु गोरक्षनाथ की कृपा से हुआ माना जाता है। ऐसे में मेले में पहुंचने वाले भक्तजन सर्वप्रथम गुरु गोरक्षनाथ के टीले पर जाकर शीश नवाते है फिर गोगाजी की समाधि पर आकर ढोक लगाते है।
लोक देवताओं में प्रथमः जाहरवीरः-
राजस्थान के लोक देवताओं के सम्बन्ध में एक चर्चित दोहे में कहा गया है। ‘‘ पाबू, हडबू, रामदे, मांगलिया, मेहा। पांचू पीर पधारज्यों, गोगाजी जेहा‘‘
राजस्थान के पांचों लोकदेवताओं में गोगाजी को समय की दृष्टि से प्रथम माना गया है। गोगाजी के प्रति श्रद्धा, विश्वास व आस्था का भाव प्रदेश के गॉव -गॉव में देखा जा सकता है जहॉ लोग अपने आराध्य वीर गोगादेव की पूजा करते है। प्रदेश की लोक संस्कृति में गोगाजी के प्रति अपार आदर भाव की व्यापकता को देखते हुए कहा गया है कि ‘‘ गाँव - गाँव में खेजडी, गाँव- गाँव में गोगा‘‘ वीर गोगाजी का सम्मोहक, प्रेरक एवं आदर्श व्यक्तित्व इतिहासकारों, साहित्यकारों व संस्कृतिप्रमियों के लिए सदैव आकर्षण का केन्द्र रहा है। विद्वानों व इतिहासकारों ने उनके जीवन को शौर्य, धर्म, पराक्रम व उच्च जीवन आदर्शों का प्रतीक माना है।
सर्वधर्म सम्भाव की तीर्थ स्थलीः-
गोगामेडी स्थित गोगाजी का मंदिर साम्प्रदायिक सद्भाव का अनूठा प्रतीक है। मंदिर में एक हिन्दू व एक मुस्लिम पुजारी खडे रहते है। इसी कारण यहां सभी धर्मो मे विश्वास करने वाले श्रद्धालू बिना किसी भेद के एक साथ आकर शीश नवाते है। मेले के दौरान चारों तरफ से उमड रहे जन सैलाब के बीच अलग अलग समूहों से उठ -उठ कर गूंजती ‘‘जाहर वीर ‘‘ ‘‘ व ‘‘ ‘‘ गोगापीर ‘‘ के जयकारों की गूंज से सृजित भक्तिमय माहौल का साक्षात करें तो दरअसल धर्म, जाति या सम्प्रदाय जैसी बातें बेमानी हो जाती हैं। बस ऐसा प्रतीत होता है कि आराध्य देव वीर गोगाजी तथा गुरु गोरक्षनाथ के प्रति भक्ति की कोई अविरल धारा बहती जा रही है।
लोकमान्यता व लोककथाओं के अनुसार गोगाजी को सांपों के देवता के रूप में भी पूजा जाता है। लोग उन्हें गोगाजी चौहान, गुग्गा, जाहिरवीर व जाहिर पीर के नामों से पुकारते हुए अपने भावों का इजहार करते है। इनका अवतरण गुरु गोरक्षनाथ की कृपा से हुआ माना जाता है। ऐसे में मेले में पहुंचने वाले भक्तजन सर्वप्रथम गुरु गोरक्षनाथ के टीले पर जाकर शीश नवाते है फिर गोगाजी की समाधि पर आकर ढोक लगाते है।