
प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है गोगामेड़ी
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गोगामेड़ी उत्तर भारत का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। यहां पर एक माह (भाद्रपद) में मेला भरता है यह राजस्थान के चुरू जिले के ददरेवा के प्रतापी शासक जाहरवीर गोगाजी चौहान की याद में भरता है। गोगामेड़ी गांव एक हजार वर्ष पहले सुरम्य वन था जिसमें गोगाजी चौहान और मोहम्मद गजनवी के मध्य भीषण युद्ध हुआ था जिसमें जाहरवीर गोगाजी का बलिदान हुआ था।
इस मेले का प्रबन्धन जिला प्रशासन के तत्वाधान में मेला प्रबन्ध समिति करती है। देवस्थान विभाग होता है जिसमें पूर्वाचल के श्रद्धालु अधिक आते हे इसे ''पूर्वियों का मेला'' कहते है। शुक्ल पक्ष की सम्तमी, अष्टमी व नवमी को द्वितीय मुखय पर्व होता है। मेले का शुभारंभ पशुपालन विभाग की ओर से किया जाता हैं।
गोगामेड़ी में उपखण्ड अधिकारी नोहर को मेला मजिस्ट्रेट जाता है। अतिरिक्त जिला कलक्टर नोहर मेले में दोनों ही क्षेत्रों में पर्यवेक्षण करते हैं।
गोगामेड़ी में राजस्थान के साथ-साथ हरियाणा, पजांब, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट, छत्तीसगढ, दिल्ली और चण्डीगढ से श्रद्धालु बहुतायत से आते है गोगामेड़ी में आने वाले पूर्वाचल के श्रद्धालु पीले वस्त्र धारण करके आते है। श्रद्धालु गोरक्षरटीला में स्थित गोरक्षगंगा तालाब में स्नान करके पूजा करते है उसके बाद गोगामेड़ी में पूजा अर्चना करते है।
गोगाजी के वर्ष भर में करीब पच्चीस लाख श्रद्धालु आते है। साठ हजार से अधिक गोगाजी के मन्दिर है। सभी मन्दिरों के निर्माण के समय यहां से मिट्टी ले जाकर उसी स्थापना करते है। गोगाजी के मन्दिर में उनके सेनापति नाहरसिंह (नन्दीदत्त) पाण्डे के वंद्गाज पुशतैनी पुजारी है। बाद में चायल मुसलमान जो कि फिरोजशाह तुगलक के समय चौकीदार नियुक्त किये गये थे वे भी आजादी के बाद पूजा करने का काम करने लगे।
यहां पर भक्तजन अपनी अनेक मन्नतें लेकर आते है। निःसन्तान, शारीरिक और मानसिक कष्टों बीमारियों, नौकरी, व्यापार, सर्पदंश से पीड़ित आदि अनेक लोग अपने कष्टों से मुक्ति के लिए आतें है। समस्या के समाधान होने पर पुनः बागड की यात्रा करते है।
गोगाजी को मनाने, पूजने की अलग-अलग परम्परायें और मान्यतायें है। रीति रिवाज भी भिन्न-भिन्न है। सभी प्रदेशों में गोगाजी की पूजा वीर रूप मे की जाती है। उनके भक्त घुड सवार रूप में गोगाजी की पूजते है।
भक्त हाथों में डमरू सारंगी, ढोल आदि वाद्य यन्त्र लेकर बजाते व गोगाजी के गीत गाते चलते है। नाचते गाते भक्तों का जोद्गा देखने लायक होता है वे शरीर पर छड ी से वार करते है। समूह में भक्त एक निशान लेकर चलते है जिसे नेजा कहते है। कुछ भक्त पेट के बल भी चलते है जिसे कनक दण्डवत कहते है। गोगाजी को अर्पित किये जाने वाले प्रसाद में दाल, प्याज नारियल ध्वजा, मखाणा, बताद्गाा, मिठाई, हलवा, कपङा, सजावट व श्रृंगार का सामान, चन्दन बूरा आदि प्रमुख है। गोगाजी के मन्दिर में समाधि पर गोगाजी की घुड सवार मूर्ति उत्कीर्ण है। साथ में उनके वीर सेनापति नारहसिंह पाण्डे की पवित्र कुण्ड है। श्रद्धालु यात्रा समाप्ति की थपकी इस कुण्ड के पवित्र जल से लेते है।
इस मेले में यात्रियों की सूविधा के लिए राजस्थान सरकार की ओर से सफाई, रोद्गानी, बेटीकेडिग्स छाया, चिकित्सा, सुरक्षा आदि के प्रबन्ध किये जाते है। नोहर, भादरा की तथा अन्य प्रदेशों से आने वाली सैकड़ों स्वयं सेवी संस्थायें भण्डारे, चिकित्सा, पेयजल आदि की सुविधायें श्रद्धालुओं को निःशुल्क उलब्ध करवाती हैं।
गोगामेडी में यद्यपि राजस्थान सरकार ने यात्री सुविधा के विकास कार्य प्रारम्भ करवाये है तथा डेढ करोड की लागत से गोगाती जी ऐतिहासिक पैनोरोमा (स्मारक )बनाया हैं।
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इस मेले का प्रबन्धन जिला प्रशासन के तत्वाधान में मेला प्रबन्ध समिति करती है। देवस्थान विभाग होता है जिसमें पूर्वाचल के श्रद्धालु अधिक आते हे इसे ''पूर्वियों का मेला'' कहते है। शुक्ल पक्ष की सम्तमी, अष्टमी व नवमी को द्वितीय मुखय पर्व होता है। मेले का शुभारंभ पशुपालन विभाग की ओर से किया जाता हैं।
गोगामेड़ी में उपखण्ड अधिकारी नोहर को मेला मजिस्ट्रेट जाता है। अतिरिक्त जिला कलक्टर नोहर मेले में दोनों ही क्षेत्रों में पर्यवेक्षण करते हैं।
गोगामेड़ी में राजस्थान के साथ-साथ हरियाणा, पजांब, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट, छत्तीसगढ, दिल्ली और चण्डीगढ से श्रद्धालु बहुतायत से आते है गोगामेड़ी में आने वाले पूर्वाचल के श्रद्धालु पीले वस्त्र धारण करके आते है। श्रद्धालु गोरक्षरटीला में स्थित गोरक्षगंगा तालाब में स्नान करके पूजा करते है उसके बाद गोगामेड़ी में पूजा अर्चना करते है।
गोगाजी के वर्ष भर में करीब पच्चीस लाख श्रद्धालु आते है। साठ हजार से अधिक गोगाजी के मन्दिर है। सभी मन्दिरों के निर्माण के समय यहां से मिट्टी ले जाकर उसी स्थापना करते है। गोगाजी के मन्दिर में उनके सेनापति नाहरसिंह (नन्दीदत्त) पाण्डे के वंद्गाज पुशतैनी पुजारी है। बाद में चायल मुसलमान जो कि फिरोजशाह तुगलक के समय चौकीदार नियुक्त किये गये थे वे भी आजादी के बाद पूजा करने का काम करने लगे।
यहां पर भक्तजन अपनी अनेक मन्नतें लेकर आते है। निःसन्तान, शारीरिक और मानसिक कष्टों बीमारियों, नौकरी, व्यापार, सर्पदंश से पीड़ित आदि अनेक लोग अपने कष्टों से मुक्ति के लिए आतें है। समस्या के समाधान होने पर पुनः बागड की यात्रा करते है।
गोगाजी को मनाने, पूजने की अलग-अलग परम्परायें और मान्यतायें है। रीति रिवाज भी भिन्न-भिन्न है। सभी प्रदेशों में गोगाजी की पूजा वीर रूप मे की जाती है। उनके भक्त घुड सवार रूप में गोगाजी की पूजते है।
भक्त हाथों में डमरू सारंगी, ढोल आदि वाद्य यन्त्र लेकर बजाते व गोगाजी के गीत गाते चलते है। नाचते गाते भक्तों का जोद्गा देखने लायक होता है वे शरीर पर छड ी से वार करते है। समूह में भक्त एक निशान लेकर चलते है जिसे नेजा कहते है। कुछ भक्त पेट के बल भी चलते है जिसे कनक दण्डवत कहते है। गोगाजी को अर्पित किये जाने वाले प्रसाद में दाल, प्याज नारियल ध्वजा, मखाणा, बताद्गाा, मिठाई, हलवा, कपङा, सजावट व श्रृंगार का सामान, चन्दन बूरा आदि प्रमुख है। गोगाजी के मन्दिर में समाधि पर गोगाजी की घुड सवार मूर्ति उत्कीर्ण है। साथ में उनके वीर सेनापति नारहसिंह पाण्डे की पवित्र कुण्ड है। श्रद्धालु यात्रा समाप्ति की थपकी इस कुण्ड के पवित्र जल से लेते है।
इस मेले में यात्रियों की सूविधा के लिए राजस्थान सरकार की ओर से सफाई, रोद्गानी, बेटीकेडिग्स छाया, चिकित्सा, सुरक्षा आदि के प्रबन्ध किये जाते है। नोहर, भादरा की तथा अन्य प्रदेशों से आने वाली सैकड़ों स्वयं सेवी संस्थायें भण्डारे, चिकित्सा, पेयजल आदि की सुविधायें श्रद्धालुओं को निःशुल्क उलब्ध करवाती हैं।
गोगामेडी में यद्यपि राजस्थान सरकार ने यात्री सुविधा के विकास कार्य प्रारम्भ करवाये है तथा डेढ करोड की लागत से गोगाती जी ऐतिहासिक पैनोरोमा (स्मारक )बनाया हैं।
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