गायों की सेवा से गोगाजी कहलाए
लोकदेवता जाहरवीर गोगाजी को सामाजिक समरसता के प्रतीक थे। हालांकि देव रूप में भी उन्हें प्राथमिकता से पूजा जाता है परंतु विशेष तौर पर उनकी अछूतों के प्रति उदारता को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। चौहान वंशीय महाराजा उमरपाल के पुत्र जेवरसिंह एवं महारानी बांछल के पुत्र गोगाजी ने अपने शासनकाल के दौरान छोटी-छोटी जाति के लोगों के लिए पाठशालाएं बनवाकर उन्हें शिक्षित करके अपनी पलटन मे ऊंचे-ऊंचे पदों पर नियुक्त कि या था। मिसाल के तौर पर भजू चर्मकार को कोतवाल एवं रतना सफाई कर्मचारी उनके सिपलाहकार थे। बताया जाता है कि गो माता की सेवा करने से ही वे गोगाजी कहलाए। उनके नगर में 51 गो शालाएं जिनमें 7 हजार गाएं, 11 सौ बैल और 8 0 सांड के अलावा 8 हजार बच्छियां और बछड़े थे। गुरू गोरखनाथ के शिष्य जाहरवीर की शादी तंदूल नगरी के राजा सिंधासिंह की पुत्री श्रीयल रोज के साथ हुई थी। इतिहासकारों का मानना है कि गोगाजी की मौसी काछल के पुत्र अरचन व सरचन द्वारा उनकी पत्नी श्रीयल को बुरी नजर से देखने उपरांत गोगाजी ने उनका वध कर दिया था जिसे उनकी मां बांछल सहन नहीं कर पाई उन्होंने गोगाजी से अपनी सूरत नहीं दिखाने को कहा। इसी बात से पीडि़त हुए गोगाजी गुरू गोरखनाथ की शरण में चले गए। पत्नी श्रीयल के आग्रह पर वे रात के समय महल में जाते थे। इस बात की जानकारी उनकी मां को लगने पर जाहरवीर अपने घोड़े सहित धरती में समा गए थे जो स्थान आज गोगामेड़ी के नाम से जाना जाता है।
लोकदेवता जाहरवीर गोगाजी को सामाजिक समरसता के प्रतीक थे। हालांकि देव रूप में भी उन्हें प्राथमिकता से पूजा जाता है परंतु विशेष तौर पर उनकी अछूतों के प्रति उदारता को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। चौहान वंशीय महाराजा उमरपाल के पुत्र जेवरसिंह एवं महारानी बांछल के पुत्र गोगाजी ने अपने शासनकाल के दौरान छोटी-छोटी जाति के लोगों के लिए पाठशालाएं बनवाकर उन्हें शिक्षित करके अपनी पलटन मे ऊंचे-ऊंचे पदों पर नियुक्त कि या था। मिसाल के तौर पर भजू चर्मकार को कोतवाल एवं रतना सफाई कर्मचारी उनके सिपलाहकार थे। बताया जाता है कि गो माता की सेवा करने से ही वे गोगाजी कहलाए। उनके नगर में 51 गो शालाएं जिनमें 7 हजार गाएं, 11 सौ बैल और 8 0 सांड के अलावा 8 हजार बच्छियां और बछड़े थे। गुरू गोरखनाथ के शिष्य जाहरवीर की शादी तंदूल नगरी के राजा सिंधासिंह की पुत्री श्रीयल रोज के साथ हुई थी। इतिहासकारों का मानना है कि गोगाजी की मौसी काछल के पुत्र अरचन व सरचन द्वारा उनकी पत्नी श्रीयल को बुरी नजर से देखने उपरांत गोगाजी ने उनका वध कर दिया था जिसे उनकी मां बांछल सहन नहीं कर पाई उन्होंने गोगाजी से अपनी सूरत नहीं दिखाने को कहा। इसी बात से पीडि़त हुए गोगाजी गुरू गोरखनाथ की शरण में चले गए। पत्नी श्रीयल के आग्रह पर वे रात के समय महल में जाते थे। इस बात की जानकारी उनकी मां को लगने पर जाहरवीर अपने घोड़े सहित धरती में समा गए थे जो स्थान आज गोगामेड़ी के नाम से जाना जाता है।
source-श्रीनिवास सोनी. ददरेवा से