युगपुरूष : जाहरवीर गोगादेव चौहान

जाहरवीर गोगाजीर चौहान वर्तमान चुरू जिले की राजगढ़ तहसील के ददरेवा गांव (तत्कालीन दद्रिरेक नगर) के प्रतापी शासक हुये जिनका राज्य पर्याप्त भू-भाग में फैला हुआ थार इनकी माता का नाम बाछल और पिता का नाम राजा जेवर था। इनके दादाजी का नाम राव उमर तथा दादी का नाम रामकौर था। इनके माता-पिता के सन्तानर न होने के कारण उन्होने गुरू गोरक्षनाथ की अराधना की। उनकी तपस्यार से प्रसन्न होकर गुरू गोरक्षनाथ ने वरदान के अवतार थे। गुरू गोरक्षनाथ ने अपने तपोबल से जब देखा किसर राजा जेवर के सन्तानर के लेख नहीं है तो उन्होने योगबल व तन्त्रविद्या के सुक्ष्म शरीर को गुग्गल में प्रवेद्गा करवारकर रानी बाछलर के गर्भ में प्रति स्थापित किया था। सम्भवतः इसी मान्यता के चलते गोगाजी को सर्पो के देवता के रूप में पूजा की जाती है। ये पराक्रमी वीर, योद्धा एवं कुद्गाल संगठन कर्ता थे। इनके जीवन काल और कालक्रम के निर्धारण के में अभी विद्वान और इतिहासकार एकमत नहीं है अलग-अलग राय होने के बावजूद अधिक मान्यता वाला मत यहीं है कि ये मोहम्मद गजनवी के समकक्ष है तथा इनका युद्ध मोहम्मद गजनवी के साथ सोमनाथ के मन्दिर को लुटने जाने के वक्त हुआ था। उसी युद्ध में वीरवर गोगाजी का बलिदान हुआ। बताया जाता है कि साथ सोमनाथ के मन्दिर को लुटने जाने के वक्त जाहरवीर ने सम्पूर्ण उत्तर भारत के राजाओं से संगठित होकर इस युद्ध में भाग लेने का निमान्त्रण दिया था। सभी राजाओं ने यह स्वीकार कर अपनी अपनी सेनायें सजाकर बागड देद्गा की राजधानी गढ ददरेवा की ओर कुच दिया था गजनवी को गुप्तचरों के माध्यम से इसकी सुचना मिल गई थी। उसने अपनी गति और मार्ग बदल लिया। गोगामेडी में तत्कालीन बियाबान लक्खी वन था । इसी वन से गुजरते हुयें गजनवी पर गोगाजी ने आगे बढकर धावा बोल दिया डटकरर संघर्ष हुआ। गजनवी की सेना ने वीर शुरमाओं को काबूर करने के लियें गायों के झुण्ड के पूंछ में आग लगाकर गोगाजी की सेना में छोड जिससे भीषण संहार हुआ। इस युद्ध में गोगादेव के बहादुर सेनापति व राजगुरू नाहरसिंह पाण्डे(नन्दीदत्त) भी गम्भीर रूप सेर घायल हो गयें। गोगादेव जी व उनके परिवार के योद्धा तथा सेना वीरगति को प्राप्त हो गयें । जानकारों के अनुसार घायल नन्दीदत्त ने गोगाजी का अंतिम संस्कार करवायार तथा राजधानी ददरेवा में महिलाओं ने जौहरर कर अपने प्राणों का त्याग कर दिया था। एक अन्य मत के अनुसार गोगाजी का सिर धड़ से अलग हो गया गुरू गोरक्षनाथ के द्गिाष्य होने तथा नाथ सम्प्रदाय में दीक्षित होने के कारण इनकी पार्थित देह को युद्ध स्थल पर नाथ परम्परा के अनुसार सामथि दे दी गई तथा सिर को राजधानी में ले जाकर विधिविदत संस्कार कियार गया। यह मत पुष्ट इस बात से होता है कि ददरेवा की भेडी को शीद्गामेडी तथा गोगामेडी की मेडी को धूर (दड ) मेडी कहा जाता है।
विभिन्न रजवाडों प्रदेद्गाों से आई सहायता सेनायें इकठ्‌ठी हुई तब तक गोगाजी का बलिदान हो चुका था। विराट भारत के दर्द्गान गोगामेडी में हुई सहायता सेनाओं को वापसी की छाप नाहरसिंह पाण्डे ने उनकी पीठ पर रक्त के हाथों के छाप लगाकर दी थी गोगाजी की इस बात की पुष्टि ऐतिहासिंक प्रमाणों से हो या ना हो पर परम्पराओं से होती है। गोगामेडी में आनेवाले भक्तजन आज भी समूहों में आते है उनके पास एक निद्गाान (तेज) होता है जो उस समय के राजचिन्ह का प्रतीक हो सकता है ढोल नगाडे बजाते, जोद्गा में शरीर पर सांकलो (छडी ) से वार करते मदमस्त होकर ''वीर की मदद-मदद '' के नारे लगाते है। पीत वस्त्र और केसरिया बाना धारण करते है जो उस समय के युद्ध सैनिको की पौद्गााक थी। वहीं परम्परा एक हजार वर्षो बाद भी जिन्दा है इसी प्रकार इनकी ससुराल सिझयागढ (रानी सीरियल का पीहर) से आई सेनाओं ने शोक स्वरूप अपनी रसद सामग्री (दाल,भुनी,प्याज,खील,यानि भुने चावल) समाथि पर अर्पित कियें। रानी सरियल के लिय लाया श्रंगार उनके सती होने के बाद वहां अर्पित कर दिया। आज भी प्रसाद में वहीं दाल,प्याज और खील तथा सीरियल का श्रंगार अर्पित किया जाता है। यात्रा की स्वीकृति नाहरसिंह कुण्ड पर बा्रहमण हिन्दु पुजारी जल कीछाप देकर करतें है। गोगाजीर के कालक्रम में उनका जन्म विक्रम सम्वत्‌ ९९२ (ईस्वी सन्‌ ९३५) व बलिदान विक्रम संम्वत्‌ १०८२ (ईस्वी सन्‌ १०२५) स्वीकार किया जाता है जो सर्वाधिक तर्कसंगत है। ऐसी श्रति है कि गोगजी के पौत्र सज्जनसिंह चौहान ने गोगामेडी़ के वर्तमान मन्दिर की नींव समाधि स्थल के रूप में रखीर थी जिसकी पूजा अर्चना की जाती रहीं। पुजारी के रूप में नाहरसिंह पाण्डे के वंद्गाज हीं प्रतिष्ठित हुयें। फिरोजद्गााह तुगलक ने किसी चमत्कार के कारण इस स्थान का सौन्दर्यकरण और विस्तार किया। अपने सैनिकों को इसकी रक्षा का भार सौपा जिन्होने आगे चलकर ढीलकी चायलान गांव बसाया। सन्‌ १९११में महाराजा गंगासिंह बीकानेर स्टेट की ओर से वर्तमान स्वरूप प्रदान किया गया।
गोगाजी ने प्रमुख रूप से राष्ट्र रक्षा, धर्म एवं संस्कृति तथा गौ रक्षा के लियें अपना सर्वस्व न्यौछावर किया वहीं सामाजिक समरसता के महान्‌ पुरोघा थे। उन्होने तत्कालीन घोर अछुत मानी जाने वाली मेघवाल, वाल्मिकी, बावरीकी आदि जातियों के युवकों को राजकार्य में हिस्सा दिया तथा समरस समाज निर्माण की दिद्गाा में मील कार पत्थर रख दिया। सभी जाति धर्म के लोग गोगाजी की मान्यता करते है पर समाज का निम्नतम वर्र्ग अपने महानायक को जिस श्रद्धा और आस्था से मान्यता देता है वह देखने लायक है। एक अनुमान के अनुसार भारतवर्ष में करीब सात करोड की संखया में गोगाजी का इतिहास जन श्रतियों और लोक मानस में ही सुरक्षित है। तत्कालीन इतिहासकारो,लेखको और कवियों ने इनका अधिक वर्णन नहीं किया है सम्भवतः इनके राष्ट्र रक्षा संगठन में व्यरत रहने तथा तत्कालीन सामाजिक मान्यताओं को तोड कर सर्वजाति धर्म एकता के नारे को रूढिवादी समाज ने मान्यता प्रदान नहीं की होगी जिससे इनके यद्गाोगान को लेखन कम से कम मिलता है। अलग-अलग समाजो, में गोगाजी के मनाने की पम्परार और तौर तरीके अलग-अलग है। कई सर्वमान्य मत भी है इनके रात्रि जागरण होते है जिनमें भजन,जन्म, विवाह और युद्ध के किस्से सुनायें जाते है। इनके चमत्कारों का वर्णन होता है धूप और जोत होती है। भक्तजनों पर घोट आती है। जिससे वे शरीर पर छडी़ से वार करते है तथा मस्त होकर नाचते है। जागरण करने वालों जागा, समईया आदिर नामों से पुकारा जाता हैं। वाध यंन्त्रों में डमरू (डेरू), ढोल, सांरगी होती है। प्रत्येक माह की दोनों पक्षों की नवमी इनकी तिथियां मानी जाती है राजस्थान में कहावत ''गांव-गांव अर खेजडी '' इनकी व्यापक मान्यता को प्रमाणित करती है। हमारें यहां खीर,लापसी,चुरमा,सेवइयां बनती है जिनका भोग लगता है प्रसाद में कच्चा दुध,आखा(बाजरे/मोठ के दाने), पताद्गाा, खील, मखणा नारियल,ध्वजा,चढायें जाते है गोगानवी के दिन घरों में दहीं बिलोया नहीं जाता हैं। गो-पूजन की पम्परा भी हैं। गोगाजी के दरबार में सर्पदंद्गा से पीडि त निःसन्तान, मानसिक रोगी(प्रतबाधा), व विभिन्न शारीरिक व्याधियों से पीडि त अधिक आते है व्यापार, नौकारी, तरक्की आदि सभी प्राकर की समस्याओ से पीडि त बाबा के यहां आते राहत पाते है। खुद्गाी से गुणवान करते है। हमें ऐसे महान्‌ सपूतों रणबांकुरों व राष्ट्र नायकों से प्रेरणा लेनी चाहियें।
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